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क्या आपको पता है बनारस में ऐसा क्या है जो सब जाना चाहते है ?
Varanasi is located in uttarpradesh(up),india famous for some religious point of view.
वाराणसी उत्तर प्रदेश का  एक जिला जो धार्मिक कारणों से बहुत प्रसिद्ध है
यहां सिर्फ हिन्दू नहीं बल्कि सभी धर्मो के प्रशिड धार्मिक स्थान है।
कुछ प्रसिद्ध मंदिर और घाट

काशी विश्वनाथ मंदिर
दश्वाधम घाट
धमेक स्तूप
संकट मोचन हनुमान मंदिर
विशालाक्षी
दुर्गा मंदिर
तुलसी मानस मंदिर
नेपाली मंदिर
पार्श्वनाथ जैन मंदिर
हरिश्चंद्र घाट

वाराणसी मराठो द्वारा विकसित नगरी है यहां पर 100 से भी अधिक घाट है और जैन धर्म और बुद्ध धर्म के पवित्र स्थल है

वाराणसी बौद्ध धर्म के पवित्रतम स्थलों में से एक है और गौतम बुद्ध से संबंधित चार तीर्थ स्थलों में से एक है। शेष तीन कुशीनगरबोध गया और लुंबिनी हैं। वाराणसी के मुख्य शहर से हटकर ही सारनाथ है, जहां भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम प्रवचन दिया था।

जैन धर्म के 23 वे तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जन्म भी यहीं वाराणसी जैसे पवित्र स्थान पर हुआ



map location of temples


काशी विश्वनाथ मंदिर
ये मंदिर श्री भोलनाथ जी का प्राचीन मंदिर है।

हरीश चन्द्र घाट(मणिकर्णिका घाट)
हरीश चंद्र घाट सत्यवादी हरीश चन्द्र जी के द्वारा बनाया गया है,मान्यता है कि जिनका संस्कार इस घाट(मुर्दाघर) में होता है उनको सीधा मोक्ष की प्राप्ति होती है। 

संगम(गंगा,यमुना,सरस्वती)
3 पवित्र नदियों का संगम इस पावन स्थान पर होता है
स  -  सरस्वती
ग    -    गंगा
य     -  यमुना

इसी संगम के घाट पर प्रधानमंत्री मोदी जी कई बार आकर  स्नान कर चुके है ।


प्रसिद्ध मंदिर काशी के

 श्री काशी विश्वनाथ मंदिर

यह भगवान शिव का प्राचीनतम मंदिर है जिसे स्वर्ण मंदिर के रूप में भी जाना जाता है. भगवान् शिव का काशी से विशेष महात्य है. इन्हें काशी के नाथ देवता भी कहा जाता है कि जिस बिंदु पर पहले ज्योतिर्लिंग, जो दिव्या प्रकाश में स्थित शिव का प्रकाश है. काशी में घाट और उत्तरवाहिनी गंगा एवं मंदिर में स्थापित शिवलिंग वाराणसी को धर्म,अध्यात्म,भक्ति के तरफ दर्शकों को आकर्षित करता है।



मणिकर्णिका घाट
इस घाट से जुड़ी भी दो कथाएं हैं। एक के अनुसार भगवान विष्णु ने शिव की तपस्या करते हुए अपने सुदर्शन चक्र से यहां एक कुण्ड खोदा था। उसमें तपस्या के समय आया हुआ उनका स्वेद भर गया। जब शिव वहां प्रसन्न हो कर आये तब विष्णु के कान की मणिकर्णिका उस कुंड में गिर गई थी। दूसरी कथा के अनुसार भगवाण शिव को अपने भक्तों से छुट्टी ही नहीं मिल पाती थी। देवी पार्वती इससे परेशान हुईं और शिवजी को रोके रखने हेतु अपने कान की मणिकर्णिका वहीं छुपा दी और शिवजी से उसे ढूंढने को कहा। शिवजी उसे ढूंढ नहीं पाये और आज तक जिसकी भी अन्त्येष्टि उस घाट पर की जाती है, वे उससे पूछते हैं कि क्या उसने देखी है?प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार मणिकर्णिका घाट का स्वामी वही चाण्डाल था, जिसने सत्यवादी राजा हरिशचंद्र को खरीदा था। उसने राजा को अपना दास बना कर उस घाट पर अन्त्येष्टि करने आने वाले लोगों से कर वसूलने का काम दे दिया था। इस घाट की विशेषता ये है, कि यहां लगातार हिन्दू अन्त्येष्टि होती रहती हैं व घाट पर चिता की अग्नि लगातार जलती ही रहती है, कभी भी बुझने नहीं पाती।

कालभैरव मन्दिर

यह विशेसरगंज में हेड पोस्ट ऑफिस के पास वाराणसी का महत्वपूर्ण एवं प्राचीन मंदिर है। भगवान कलभैरव को “वाराणसी के कोतवाल” के रूप में माना जाता है, बिना उनकी अनुमति के कोई भी काशी में नहीं रह सकता है। रविवार को इनके दर्शन का विशेष महत्व है.

मृत्युंजय महादेव मन्दिर

कालभैरव मंदिर के निकट दारानगर के मार्ग पर भगवान शिव का यह मंदिर स्थित है। इसके अलावा इस मंदिर के बहुत सारे धार्मिक महत्व हैं, जिसका पानी कई भूमिगत धाराओं का मिश्रण है और कई रोगों को नष्ट करने के लिए उत्तम है।

विश्वनाथ मन्दिर बी एच यू

महामना मालवीय जी स्थपित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के परिसर में स्थित नया विश्वनाथ मन्दिर जो बिड़ला जी द्वारा निर्मित है। सभी जाति या पंथ के लिए खुला है।

संकठा मन्दिर

सिंधिया घाट के पास, “संकट विमुक्ति दायिनी देवी” देवी संकटा का एक महत्वपूर्ण मंदिर है। इसके परिसर में शेर की एक विशाल प्रतिमा है। इसके अलावा यहां 9 ग्रहों के नौ मंदिर हैं।

तुलसी मानस मन्दिर

वाराणसी में निर्मित यह मंदिर भगवान राम को समर्पित है यह उस स्थान पर स्थित है जहां महान मध्यकालीन द्रष्टा गोस्वामी तुलसीदास रहते थे और महाकाव्य “श्री रामचरितमानस” लिखा करते थे, जो रामायण के नायक भगवान राम के जीवन का वर्णन करता है। तुलसीदास जी के महाकाव्य से छंद दीवारों पर अंकित हैं तथा यह दुर्गा मंदिर के निकट है।

संकटमोचन मन्दिर

दुर्गा मंदिर के रास्ते पर असी नदी धारा के निकट भगवान हनुमान का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। भगवान हनुमान को “संकटमोचन” के रूप में भी जाना जाता है जो मुसीबतों से मुक्ति दिलाता है। यह मंदिर गोस्वामी तुलसीदास द्वारा स्थापित किया गया है। यह मंदिर “बंदर” मंदिर के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि बहुत सारे बंदर परिसर के अंदर हैं।

दुर्गा मन्दिर

यह प्रसिद्ध मन्दिर 18 वी सदी में बनाया गया था। मंदिर पर पत्थर कारीगरी का बहुत सुन्दर काम है, यह नागौर शिल्प का एक अच्छा उदाहरण है। माँ दुर्गा शक्ति प्रतीक है जो संपूर्ण विश्व को नियंत्रित करती है। यहाँ माँ दुर्गा कुष्मांडा स्वरूप में विद्यमान हैं. “दुर्गाकुंड” मंदिर के निकट एक प्राचीन कुंड स्थित है।
माँ अन्नपूर्णा मन्दिर
काशी विश्वनाथ मंदिर के पास, देवी अन्नपूर्णा का महत्वपूर्ण मंदिर है, जिसे “अन्न की देवी ” माना जाता है.

भारत माता मन्दिर

महात्मा गांधी ने 1936 में इस मंदिर का उद्घाटन किया और संगमरमर से भारत माता का मानचित्र यहाँ पर बनाया गया है। इस अवसर पर राष्ट्रवादियों बाबू शिव प्रसाद गुप्ता (भारत रत्न) और श्री दुर्गा प्रसाद खत्री ने प्रमुख मुद्राशास्त्री और पुरातत्ववेत्ता को उपहार में दिया था।

कला के लिए प्रसिद्ध
वाराणसी की संस्कृति कला एवं साहित्य से परिपूर्ण है। इस नगर में महान भारतीय लेखक एवं विचारक हुए हैं, कबीर, रविदास, तुलसीदास जिन्होंने यहां रामचरितमानस लिखी, कुल्लुका भट्ट जिन्होंने १५वीं शताब्दी में मनुस्मृति पर सर्वश्रेष्ठ ज्ञात टीका यहां लिखी एवं भारतेन्दु हरिशचंद्र और आधुनिक काल के जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, मुंशी प्रेमचंद, जगन्नाथ प्रसाद रत्नाकर, देवकी नंदन खत्री, हजारी प्रसाद द्विवेदी, तेग अली, क्षेत्रेश चंद्र चट्टोपाध्याय, वागीश शास्त्री, बलदेव उपाध्याय, सुमन पांडेय (धूमिल) एवं विद्या निवास मिश्र और अन्य बहुत।
यहां के कलाप्रेमियों और इतिहासवेत्ताओं में राय कृष्णदास, उनके पुत्र आनंद कृष्ण, संगीतज्ञ जैसे ओंकारनाथ ठाकुर, रवि शंकर, बिस्मिल्लाह खां, गिरिजा देवी, सिद्देश्वरी देवी, लालमणि मिश्र एवं उनके पुत्र गोपाल शंकर मिश्र, एन राजम, राजभान सिंह, अनोखेलाल, समता प्रसाद[, कांठे महाराज, एम.वी.कल्विंत, सितारा देवी, गोपी कृष्ण, कृष्ण महाराज, राजन एवं साजन मिश्र, महादेव मिश्र एवं बहुत से अन्य लोगों ने नगर को अपनी ललित कलाओं के कौशल से जीवंत बनाए रखा। नगर की प्राचीन और लोक संस्कृति की पारंपरिक शैली को संरक्षित किये ढेरों उत्सव और त्यौहार यहां मनाये जाते हैं। रात्रिकालीन, संगीत सभाएं आदि संकटमोचन मंदिर, होरी, कजरी, चैती मेला, बुढ़वा मंगल यहां के अनेक पर्वों में से कुछ हैं जो वार्षिक रूप से सभी जगहों से पर्यटक एवं शौकीनों को आकर्षित करते हैं।

few Data collected from varanasi.nic.in and Wikipedia


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